महिलाओं के मौलिक अधिकार

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    महिलाओं के मौलिक अधिकार और हमारा समाज
    सरकार और सामाजिक संगठनों के द्वारा महिलाओं की आजादी और उनके स्वालंबन की बात खूब की जाती है अखबारों में बड़े बड़े लेख महिलाओं पर लिखे जाते हैं महिलाओं की समस्या और उनके स्वालंबन सहित उनकी आजादी पर काफी कुछ लिखा जा चुका है लिखते रहने का यह सिलसिला लगातार जारी है मर्दों के साथ साथ लिखने के क्षेत्र में कई महिलाओं द्वारा महिलाओं की समस्याओं पर बहुत कुछ लिखा गया और लिखा जा रहा है। सरकारें बड़े चालाकी से लाखों महिलाओं के सामने कुछ एक सफल महिलाओं को सामने लाकर महिलाओं के सामने बतौर नजीर पेश करते हुये अपनी पीठ थपथपा कर महिला स्वालंबन कार्यक्रम का इतिश्री कर लेती है। महिला रूपी देश की आधी आबादी के साथ सरकारें और समाज पूरी ईमानदारी के साथ न्याय नहीं कर पाता है। समय के साथ साथ शिक्षा के क्षेत्र में जबसे महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है तबसे महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रतिशत बढ़ा है लेकिन समाज में व्याप्त मर्दवादी सोच महिलाओं की तरक्की और उनकी आजादी में सबसे बड़ी बाधा है। सामाजिक कुरूतियों में जकड़ी औरत और उसपर धार्मिक पाबंदियों ने औरतों के उनके हक और हुकूक से लगभग वंचित ही कर दिया है। हाल के समय पर नजर डालें तो पता चलता है कि महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली सरकारें भी महिलाओं के लिये सीमारेखा निर्धारण का काम कर रहीं है जो बहुत ही घातक है। विभिन्न धर्मों में महिलाओं और पुरूषों के लिये आचार संहिता बनाई गई है जो मर्दों को तो छूट देता है लेकिन महिलाओं पर धार्मिक आचार संहिता को सख्ती से लादा जाता है। समाज का हर दूसरा आदमी महिला सशक्तिकरण की बात करता हुआ मिल जाएगा बशर्ते महिला दूसरे घर की हो। ठीक इसी तरह जैसे बेटी बचाने के लिये बात तो सब करते है बस बेटी दूसरे के घर पैदा हुई हो। महिलाओं के प्रति यह चालाकी भरा प्रयास है जिसके सफल होने की कोई गारंटी नहीं है। सरकार बेटी बचाओं अभियान चला रही है जिसको थोड़ी बहुत सफलता अब तक मिली है वह समाज में रहने वाले जागरूक लोगों और स्वयंसेवियों के प्रोत्साहन का नतीजा कह सकते है। आज देश के किसी भी राज्य के आंकड़े उठाकर देख लीजिये महिला और पुरूष जनसंख्या में भारी अंतर साफ दिखता है इसी तरह महिलाओं पर हो रहे अत्याचार पर नजर पड़ती है तो समझ आता है कि देश की महिलाओं पर बड़े पैमाने पर अत्याचार किया जा रहा है और तमाम सरकारें इस पर अभी तक खोखले वादों के अलावा महिलाओं की आजादी और उनके स्वालंबन पर कोई ठोस कार्यक्रम का निर्धारण नहीं कर पाईं हैं। इसी तरह देश में गाजर मूली की तरह उगी स्वयंसेवी संस्थायें महिला सशक्तिकरण के नाम पर काम कर रहीं हैं और करोड़ों में खेल रही है। ज्यादातर स्वयंसेवी संस्थाओं का काम कागजों तक सिमटा हुआ है जो चिंता का विषय है। शहरों से गांवों तक महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली सरकारें जब यह कहतीं है कि गांव गांव महिलाओं को सशक्त और स्वालंबी बनाने का काम जारी है तो एक तरह से झूठ बोला जाता है और बड़ी चालाकी के साथ साबित करने की कोशिश की जाती है कि शहर में महिलाओं के सशक्तिकरण का काम पूरा हो गया है और अब गांव ग्राम में महिलाओं के सशक्तिकरण का काम चल रहा है। जबकि दूसरा पहलू यह है कि गांव की प्रधान अगर महिला है तो उसकी क्या हैसियत है यह उसका पति तय करता है इस सच्चाई को झुटलाया नहीं जा सकता। सरकार के साथ साथ समाज का नज्रिया महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह से भरा हुआ है। रही सही कसर धर्म ने पूरी कर दी है सभी तरह के धर्म औरत पर अपनी बनाई गई नियमावली थोपने की कोशिश सदियों से करते आ रहे हैं औरत ने भी इस नियमावली को अपनी नियति इस तर्ज पर मान लिया है जैसे झूठ को बार बार बोला जाता है तो सच लगने लगता है। इस भ्रम जाल में उलझी महिला को बाहर निकालने की बजाये समाज और सरकारें उसे इस जाल से बाहर नहीं निकलने देना चाहतीं।
    उपभोक्तावाद के इस दौर में महिलाओं को वस्तु बना दिया है किसी भी वस्तु को बेचने का माध्यम आज महिला है। बाजारवाद की जड़े कितनी मजबूत है इसको समझने के लिये सांवले सलौने कृष्ण के देश में बाजारवाद ने गौरा रंग सफलता की गारंटी के रूप में निरूपित कर दिया है और समाज ने इसको बड़ी सहजता से अंगीकार कर लिया है।
    महिलाओं पर होने वाले अत्याचार- महिलाओं पर होने वाले अत्याचार की बात करें तो पता चलता है कि अधिकतर मामलों को समाज के डर से दबा दिया जाता है और अगर महिला आवाज उठाती है तो समाज उसके चरित्र को लेकर टीका टीप्पड़ी करने से पीछे नहीं रहता। एक ओर सरकार कहती है कि बेटी बचाओ बेटी पढा़ओ और जब बेटी पढ़ लिखकर अपने हक और अस्मिता की लड़ाई के लिये आवाज उठाती है तो सिस्टम उस आवाज को दबाने के लिये पूरा जोर लगा देता है।जमाना बदला हमने खूब तरक्की कर ली बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी से हम बस,रेल और हवाई जहाज तक लगातार विकास की सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बड़ रहे हैं लेकिन हमारी सोच और समझने का तरीका कुछ मामलों में बेहद संकीर्ण है। हमारा समाज महिलाओं को न जाने कितने अलंकारों से सुशोभित करता है इसके बाद भी सच्चाई यह है कि कन्या भ्रूण हत्या जारी है।

    संपादक

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