प्रकृति को ऐसे बचाएं।

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                           सड़क किनारे कतार में लहलहा रहे नीम के पौधे
                     बारिश में किसी पर्यावरण प्रेमी ने यहां बिखेर दिये थे बीज 

                    बढ़ रहा आकर्षण इन पौधों से पन्ना के बायपास मार्ग का

                     
पन्ना- सड़क के किनारे कतार में दूर तक लहलहाते नीम के हरे-भरे सैकड़ों पौधों को देखकर किसी का भी मन प्रफुल्लित हो जायेगा। यह मनोरम दृश्य पन्ना शहर के बायपास मार्ग का है, जहां सड़क के किनारे पत्थरों की पिचिंग के बीच किसी पर्यावरण प्रेमी ने बारिश के मौसम में नीम के बीज बिखेर दिये थे। वही बीज बिना किसी सुरक्षा व देखरेख के अंकुरित होकर बड़े पौधों में तब्दील हो गये हैं। जिन पौधों को पर्याप्त मिट्टी व नमी
मिली है वे 10-12 फिट तक ऊँचे हो गये हैं। बायपास मार्ग में जहां तक पत्थरों की पिचिंग है, वहां सैकड़ों की संख्या में लहलहाते नीम के हरे-भरे पौधे अब सहज ही लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करते हैं।
उल्लेखनीय है कि ढाई-तीन दशक पूर्व तक रत्नगर्भा पन्ना की धरती शस्य श्यामला थी। प्रकृति के अनमोल उपहारों से समृद्ध पन्ना की यह धरा वन-उपवनों से हरी-भरी थी, जिससे यहां की आबोहवा और पर्यावरण शुद्ध था।
लेकिन तीन दशकों के दौरान आबादी बढऩे के साथ विकास की कथित अंधी दौड़ में धरती की हरीतिमा उजड़ती चली गई। आलम यह है कि पन्ना शहर के आस-पास 10 किमी के दायरे में सागौन के वृक्ष तेजी से गायब हो रहे हैं और अब तो दूसरी प्रजाति के वृक्षों पर भी कुल्हाडिय़ां चलने लगी हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि पन्ना शहर के आस-पास जंगल के नाम पर सिर्फ लेन्टाना की झाडिय़ां बची हैं। तेजी के साथ जंगल की अवैध कटाई होने से यहां का पर्यावरण बिगड़ रहा है। हर साल जहां गर्मी बढ़ रही है वहीं बारिश का क्रम भी अनियमित हो गया है। जिसका असर आम जन जीवन पर पडऩे लगा है। ऐसी स्थिति में पन्ना बायपास मार्ग पर उगे नीम के पौधे यह संदेश देते हुये प्रतीत होते हैं कि अभी भी ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ा, चेत जाओ और पर्यावरण से खिलवाड़ करने के बजाय उसका संरक्षण भी करो। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब साँस लेना भी दूभर हो जायेगा और तापमान बढऩे से जीवन संकट में पड़जायेगा।
बायपास मार्ग में सुबह की सैर पर प्रतिदिन जाने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता परशुराम गर्ग ने मुझे जब इस सुखद समाचार से अवगत कराया कि बिना किसी सुरक्षा और देखरेख के सैकड़ों नीम के पौधे किस तरह लहलहा रहे हैं तो सहसा भरोसा नहीं हुआ। सच्चाई जानने के लिये उनके साथ सुबह बायपास मार्ग पर गया और जब वहां का नजारा देखा तो सचमुच मन प्रसन्न हो गया। वहां रुकने पर ऐसा प्रतीत हुआ मानो पन्ना की धरती यह पुकार रही है कि इसी तरह से बीजों को बिखेरो और मैं फिर से उजड़ चुकी पहाडिय़ों को हरा-भरा कर दूँगी। नीम के हरे-भरे लहलहाते पौधे मानो गवाही दे रहे थे, कि हम विपरीत हालातों में भी अपने वजूद को बनाये रखने में सक्षम हैं।बारिश के मौसम में बिखेरें बीज- बारिश के मौसम ने दस्तक दे दी है, जहां-तहां मानसून पूर्व बारिश भी होने लगी है। ऐसे समय हर किसी को चाहिये कि नीम, जामुन, महुआ, आँवला जैसे
अनेकों फलदार व छायादार वृक्षों के बीज लेकर खाली पड़ी भूमि पर बिखेरें,ये बीज मिट्टी और नमी का सानिध्य मिलने पर अंकुरित हो जायेंगे, इनमें अनेकों पौधे कुछ ही सालों बाद वृक्षा बनकर न सिर्फ हमें फल व छाया प्रदान
करेंगे अपितु पर्यावरण को भी हमारे जीने लायक बनायेंगे। यदि हम पौधों का रोपण कर उनकी नियमित देखभाल नहीं कर सकते तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि जहां भी खाली रिक्त भूमि दिखे वहां बीज डाल दें। प्रतिदिन कुल्हाड़ी लेकर जंगल जाने वाले लोगों को भी यह बतायें कि बेरहमी के साथ हरे-भरे पेड़ों को काटना अपराध है। बीते तीन दशकों में बहुत पेड़ काट
लिया अब पौध रोपण कर उनकी सुरक्षा भी करो ताकि यह धरती नई पीढ़ी के रहने लायक बच सके।

अरुण सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)

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