पीड़ितों के बरी होने के बाद, सहारनपुर एसएसपी और एसपी का हो निलंबन- शाहनवाज़ आलम

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शाहनवाज़ आलम चेयरमैन अल्पसंख्यक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी

*सहारनपुर कोतवाली में युवकों को पीटने वाले पुलिसकर्मियों को किया जाये गिरफ्तार*

*गैरज़िम्मेदार बयान के लिए शलभमणि त्रिपाठी मांगें माफी*

{Sarokaar News} – लखनऊ, सहारनपुर ज़िला अदालत द्वारा आठ मुस्लिम युवकों को निर्दोष बताते हुए छोड़ दिये जाने का स्वागत करते हुए अल्पसंख्यक कांग्रेस अध्यक्ष शाहनवाज़ आलम ने इसे पुलिस के लिए शर्मनाक बताया है। उन्होंने सहारनपुर के एसएसपी आकाश तोमर और एसपी राजेश कुमार को तत्काल निलंबित कर हिरासती हिंसा में लिप्त पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार करने की मांग की है।

गौरतलब है कि 15 जून को सहारनपुर कोतवाली में आठ मुस्लिम युवकों के पुलिस द्वारा बर्बर पिटाई का वीडियो सामने आया था लेकिन एसएसपी और एसपी उसे दूसरे ज़िले का मामला बता कर घटना से ही इनकार करते रहे थे। बाद में शहर कोतवाली की घटना साबित होने के बाद पुलिस ने जाँच तो बैठाई लेकिन पहले इसे झूठ बताने वाले एसपी ही खुद इसकी जाँच कर रहे हैं। वहीं अल्पसंख्यक कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिवों के प्रतिनिधि मण्डल ने 17 जून को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से मुलाक़ात कर इस मुद्दे पर कार्यवाई की मांग की थी।

लखनऊ स्थित प्रदेश मुख्यालय से जारी प्रेस विज्ञप्ति में शाहनवाज़ आलम ने कहा कि सहारनपुर जैसी घटनाएं पुलिस विभाग के एक हिस्से में गहरे तक घुस चुके संविधान विरोधी मानसिकता के कारण हो रही हैं। जिन्हें सरकार खुद प्रोत्साहित कर रही है। इसलिए जब तक सहारनपुर के एसएसपी और एसपी निलंबित नहीं होते समाज में पुलिस की छवि नहीं सुधरेगी। उन्होंने कहा कि देवरिया से भाजपा विधायक शलभमणि त्रिपाठी ने इस हिरासती हिंसा का वीडियो ट्वीट करते हुए इसे रिटर्न गिफ्ट बताया था। उन्होंने कहा कि ऐसे ही गैर ज़िम्मेदार नेताओं के बयानबाज़ी से पुलिस हैवान बनती जा रही है। उन्हें लगता है कि जब सत्ताधारी दल के नेता ऐसा करने से खुश होते हैं तो सरकार को खुश रखने के लिए ऐसे गैर क़ानूनी काम करते रहना चाहिए। अगर कानून का राज होता तो देवरिया विधायक माफी मांग चुके होते। उन्होंने कहा की जिस घटना का विरोध सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश मदन बी लुकुर और पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह तक ने की और इसे सरकार के लिए शर्मनाक बताते हुए दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ़ कार्यवाई की मांग की थी, उस पर मुख्यमन्त्री का अब तक चुप रहना लोकतंत्र की गरिमा के अनुरूप नहीं है।