“गोदी मीडिया” के नाम एक और कीर्तिमान

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फोटो:साभार गूगल

रिपोर्टर्स सेन्स फ्रंटियर्स (आरएसएफ) की रिपोर्ट में भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति चिंताजनक

{sarokaar news} – एम एस खान, देश में लगातार मेनस्ट्रीम मीडिया की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया सरकार की गलत नीतियों पर सवाल करने के बजाय सरकार की जनविरोधी नीतियों के समर्थक और सरकार के प्रवक्ता की भूमिका का निर्वाहन करने का आरोप लगता रहा है। सरकार की गलत नीतियों के साथ खड़े भारत की मीडिया की साख लगातार गिर रही है इसके बाद भी मीडिया इन सब से बेपरवाह सरकार की भक्ति में लीन होकर अपने लोकतांत्रिक कर्तव्यों से मुँह चुरा रही है। दरअसल पिछले वर्षों में जिस तरह से देश की मीडिया के कामकाज को लेकर बहस हुई है और इससे एक शब्द निकलकर आया है “गोदी मीडिया” इस शब्द को सार्थक करने में देश की मेनस्ट्रीम मीडिया में शामिल एक एक पत्रकार ने अपना अभूतपूर्ण योगदान देकर इस शब्द को सार्थकता प्रदान की है।

एक बच्चा भी जानता ही कि वह सबसे सुरक्षित अगर कहीं है तो वह गोद है, देश की मीडिया को भी यह दिव्य ज्ञान 2014 के बाद हो चुका है। इसलिये अब गोदी मीडिया के पत्रकार आमजन के बीच अपनी उपस्थिति और उनके मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय अपने आकाओं द्वारा प्रदत्त एयर कंडीशन रूम में बैठकर लोकतंत्र के चौथे खंबे को कोल कोलकर खोखला कर रहे हैं।

भक्ति में ऐसा रस है कि जिसने एक बार इसका रसास्वादन कर लिया फिर वह उसी में डूब जाता है। भारतीय मीडिया भी पूंजीपतियों के स्विमिंग पूल में गोते लगा लगाकर पत्रकारिता की परत धो रहा है ताकि भक्तिभाव में डूबा हुआ सरकार का सच्चा भक्त बन सके। अक्सर “गोदी मीडिया” के बीच यह प्रतिस्पर्धा भी चलती रहती है कि वह ही सबसे बड़ा वाला “गोदी मीडिया” पत्रकार है। हर भक्त का सपना होता है कि उसकी गिनती परम भक्तों की श्रेणी में हो, इसके लिये वह दिन रात सरकार की भक्ति में डूबकर नित नये कीर्तिमान गढ़ रहे हैं। “गोदी मीडिया” की भक्ति को देखकर विदेशों में बज रहे डंके की आवाज ने सरकार को भी विचलित कर दिया। आखिरकार सरकार को अभी हाल में ही “गोदी मीडिया” अपने भक्तों को हद में रहकर भक्ति करने का फरमान जारी करना पड़ा।

इस विषम परिस्थितियों में भी देश में कराह रही पत्रकारिता को जीवन देने के लिए संघर्ष कर रहे पत्रकारों का सरकार दमन करती है और उन्हें गैरकानूनी रूप से प्रताड़ित कर फर्जी मुक़दमे लादकर जेलों में ठूंस रही है। संस्थानों ने उन्हें पहले ही बाहर का रास्ता दिखा दिया है इसलिये अनगिनत पत्रकार सोशल मीडिया के माध्यम से देश में पत्रकारिता को बचाने की मुहिम में जुटे हैं और सरकार के साथ साथ कुकरमुत्तों की तरह उगे संगठनों के लोग पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं। विगत वर्षों में मीडिया की कितनी दुर्गति हुई है यह किसी से छुपा नहीं है “गोदी मीडिया” की भक्ति की चर्चायें देश की सीमा लांघते विदेशों तक जा पहुंचीं हैं।

रिपोर्टर्स सेन्स फ्रंटियर्स (आरएसएफ) की रिपोर्ट 2022 में क्या कहा गया –

दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाली पेरिस स्थित संस्था ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत पिछले साल के 142वें स्थान से फिसलकर 150वें स्थान पर आ गया है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स एक नॉन-प्रॉफ़िट संगठन है जो दुनियाभर के पत्रकारों और पत्रकारिता पर होने वाले हमलों को डॉक्यूमेंट करता है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स और नौ अन्य मानवाधिकार संगठन ने भारतीय अधिकारियों से पत्रकारों और ऑनलाइन आलोचकों को उनके काम के लिए निशाना बनाना बंद करने का आग्रह किया है साथ ही आरएसएफ ने कहा कि भारतीय अधिकारियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का सम्मान करना चाहिए और आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के लिए, राजनीति से प्रेरित आरोपों में हिरासत में लिए गए किसी भी पत्रकार को रिहा कर देना चाहिए और उन्हें निशाना बनाना तथा स्वतंत्र मीडिया का गला घोंटना बंद करना चाहिए। वैश्विक निगरानीकर्ता संस्था ने कहा है कि विशेष रूप से आतंकवाद और देशद्रोह कानूनों के तहत पत्रकारों पर मुकदमा चलाना बंद होना चाहिए।

गौरतलब है कि दुनिया भर के 180 देशों पर प्रेस की आज़ादी पर नज़र रखने वाली अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संस्था रिपोर्टर्स सेन्स फ्रंटियर्स (आरएसएफ) एक साल एक रिपोर्ट जारी करती है। इस रिपोर्ट में पिछले साल भारत की 142वीं रैंकिंग थी जो फिसल कर चिंताजनक रूप से 150वें नंबर पर आ गयी है।
आरएसएफ 2022 की रिपोर्ट में इस साल नॉर्वे (प्रथम) डेनमार्क (दूसरे), स्वीडन (तीसरे) एस्टोनिया (चौथे) और फिनलैंड (पांचवें) स्थान पर है, जबकि उत्तर कोरिया 180 देशों और क्षेत्रों की सूची में सबसे नीचे है।