{Sarokaar News} – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा, फैक्ट चेकरों, भारत छोड़ो! अभी छोड़ो, तुरंत छोड़ो! पश्चिम की सीमा से छोड़ो, चाहे पूर्व के बार्डर से छोड़ो। चाहे सडक़ से या समंदर से या हवाई मार्ग से छोड़ो, पर भारत छोड़ो। अमृत काल नहीं, तुम तो अमृत साल में ही छोड़ो, पर भारत छोड़ो। बहुत हो चुका फैक्ट चेक, हमारे नये इंडिया की जान बख्शो और हमें फिक्शन में जीने दो। तुम तो भारत छोड़ो!

हमें भी पता है कि नये इंडिया को फैक्ट चेकरों से आजादी आसानी से नहीं मिल जाएगी। मुफ्त में तो कुछ भी नहीं मिलता है, फिर आजादी की तो बात ही क्या, भले ही वह फैक्ट चेक करने वालों से ही आजादी क्यों न हो। आजादी तो लडक़र ही लेनी पड़ती है। हम भारत वालों से अच्छी तरह इस सचाई को कौन जानता होगा। हमने क्या अंगरेजों से लड़-लडक़र ही आजादी नहीं ली थी? क्या हमने लड़-लडक़र ही अंगरेजों से भारत नहीं छुड़वाया था? तब लड़े थे गोरों से, अब क्या डरेंगे देसी छोरों से! हम फैक्ट चेकरों से अपने देश को आजाद करवा कर के ही रहेंगे।

फैक्ट चेकरों से भारत छुड़वा कर ही रहेंगे। बाकी सारी दुनिया थू-थू करती है, तो करे। मीडिया की स्वतंत्रता के सूचकांक पर नया इंडिया रपटकर तली में जा गिरता हो, तो गिरे। कोई सूचकांक स्वतंत्रता को पूर्ण से आंशिक करता है, तो करे। कोई जनतंत्र कहना छोडक़र तानाशाही कहता है, तो कहे। हम छप्पन इंच वाले, ऐसे बोलों-कुबोलों से भला क्यों डरेंगे? हम ऐसे हरेक सूचकांक को झुठला देंगे और मौका बना, तो बाहर वालों को अपने घर के अंदर ताक-झांक करने के लिए हडक़ा भी देंगे। फैक्ट चेकरों से देश छुड़वाने के लिए जो भी करना पड़ा करेंगे, पर अपने लक्ष्य से तनिक नहीं डिगेंगे। हम फैक्ट चेकरों से भारत को आजाद करा के रहेंगे।

फैक्ट चेकरों से देश की आजादी के लिए संघर्ष छेड़े जाने से कोई यह नहीं समझे कि मोदी जी के राज पर फैक्ट चेकर भारी पड़ रहे हैं। या फैक्ट चेकरों से निपटने के लिए मोदी राज को बाहर से पब्लिक के आंदोलन की मदद की जरूरत है। ऐसा कत्तई नहीं है। जुबैर हो या कोई और, ऐसा कोई फैक्ट चेकर पैदा ही नहीं हुआ, जो मोदी राज के लिए परेशानी का सबब बन सकता हो। देखा नहीं कैसे मोदी राज की तर्जनी का हल्का सा धक्का लगते ही जुबैर मियां जेल की चाहरदीवारी में चक्कर खाकर ऐसे गिरे हैं कि पंद्रह रोज होने को आए, पर बाहर निकलने के दूर तक कोई आसार नहीं है। उल्टे सीतापुर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैक्ट अपने पास ही रखने की शर्त के साथ टेंपरेरी जमानत दे भी दी, तो लखीमपुर-खीरी के केस में पुलिस नापने पहुंच गयी। दिल्ली वाले मामले में तो बंदा पहले ही जेल में है। यानी पक्का इंतजाम है बंदे के फैक्टों की सारी हेकड़ी निकालने का। उस पर बंदा जेल में है, जबकि पुलिस दफाओं की फाइल मोटी करने के लिए आजाद है।

सोलिसिटर जनरल ने तो कह भी दिया है कि मामला किसी राष्ट्र विरोधी सिंडीकेट का भी हो सकता है, उसकी जांच तक जमानत देने की जल्दी नहीं करें। यानी गए फैक्ट चेकर जी बारह के भाव में। स्टेन स्वामी न सही, गौतम नवलखा या सुधा भारद्वाज तो बना ही देंगे।

पर बात सरकार की नहीं, देश की परेशानी की है। फैक्ट चेकर को जेल में बंद कर के, उसके साथ उन फैक्टों को भी जेल में बंद तो रख सकते हैं, जो वह चेक कर के सामने ला सकता था। लेकिन, यह बड़ा महंगा सौदा है। जेल में बिरयानी खिलाने का खर्चा बचा भी लें तब भी, जेल में रखने, शहर-शहर केस डालने, रिमांड पर तफ्तीश के लिए गाडिय़ों में घुमाने, सब का खर्चा कोई थोड़ा नहीं है। उसके ऊपर से सोलिसिटर जनरल, एडीशनल सोलिसिटर जनरल को बंदे की जमानत से बचाने को  छोटी-बड़ी, हर तरह की अदालतों में उतारने का खर्चा और। इस सबके बाद भी, बाहर वालों के बयानों को सार्वजनिक रूप से गलत बताने और उसके पीछे-पीछे कूटनीतिक मलहम-पट्टी करने का खर्चा भी। और हां! देसी मीडिया पर इसका ढोल और भी जोर से बजवाने का खर्चा भी कि यह सब तो कुछ भी नहीं है, सारी दुनिया में भारत का डंका तो अब भी बज ही रहा है।

फिर बात सिर्फ खर्चे की थोड़े ही है। बल्कि बात खर्चे की तो है ही नहीं। बात सामाजिक समरसता की है। फैक्ट चेकरों से असली खतरा हमारी सामाजिक समरसता को ही है। मियां जुबैर का ही किस्सा ले लो। बेचारी नूपुर शर्मा ने जो बोला था, वह तो बोल दिया था। वह अगर गलत भी था, तब भी उसका शोर मचाने का क्या फायदा? गलत बोला, यह सब को सुनाने का क्या फायदा? गलत बोल भी दिया तो सुनी-अनसुनी कर देते, तो सब लोग भूल-भाल जाते। आज-कल पब्लिक को किसी चीज का ध्यान ही कहां रहता है। लेकिन, ये तो फैक्ट चेकर हैं — फैक्ट जरूर सामने लाएंगे! ले आए फैक्ट सामने, हुआ किसी का कोई फायदा? वैसे ये नाम के फैक्ट चेकर सही, पर काम हमेशा फैक्ट सामने लाने का नहीं करते हैं। अब बताइए सीतापुर वाले बजरंग मुनि को सिर्फ मुस्लिम औरतों के साथ बलात्कार का सार्वजनिक रूप से आह्वान करने के लिए, हेट मोन्गर या नफरत फैलाने वाला करार दे दिया। ये फैक्ट हुआ क्या? इस धार्मिक आह्वान का नफरत से क्या लेना-देना? वह तो अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने फैक्ट चेक कर के मुनि के ‘सम्मानित धार्मिक नेता’ होने का सच दुनिया के सामने ला दिया, वर्ना फैक्ट चेकर की खाल ओढ़े सेकुलरिस्ट ने तो मुनि जी के सम्मान को बट्टा लगा ही दिया था और वह भी योगी जी के डबल इंजन राज में। अब सड़ते रहें जेल में।

हम फैक्ट की तानाशाही मिटाकर रहेंगे। हम फिक्शन को फैक्ट पर जीत दिलाकर रहेंगे। नये इंडिया को हम फैक्ट चेकर-मुक्त बनाकर रहेंगे। और हां, हम पहले से ही कहे देते हैं कि हम इसकी बहस में उलझकर अटकने-भटकने वाले नहीं हैं कि इसे कौन सी आजादी की लड़ाई कहा जाएगा – पहली, दूसरी, तीसरी या…। आजादी का नंबर इम्पार्टेंट नहीं है, इम्पोर्टेंट है देश की फैक्ट चेकरों से आजादी। अब और नहीं; फैक्ट चेकरों का जोर-जुल्म और नहीं। फैक्ट की तानाशाही नहीं चलेगी। राज करने वालों के फिक्शन के आगे, फैक्ट की दाल नहीं गलेगी। हम नये इंडिया को फैक्ट चेकरों से आजादी दिलाकर रहेंगे। फैक्ट चेकरों! भारत छोड़ो।

इस व्यंग्य आलेख के लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।