मध्य प्रदेश – 12 साल की बालिका को पुलिस ने पीटा

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पीड़ित बालिका की माँ अपनी 12 साल की बेटी के साथ

भारतीय लोकतंत्र ढह रहा है? अल्पसंख्यकों,आदिवासियों और दलितों को किया जा रहा अधिकार विहीन

धर्म विशेष के बच्चों के साथ हो रही पुलिसिया ज्यादती पर सब मौन

{sarokaar news} – panna madhya pradesh, गत वर्षों और देश के मौजूदा हालात में एक के बाद एक घटित हो रहे घटनाक्रम को देखने पर लगता है कि हमारे लोकतंत्र को अतीत का हिस्सा बनाने की कवायद हो रही है। जो सत्ता के साथ हैं उन्हें छोड़कर सबके सब सत्ता के निशाने पर हैं। लेखक, बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता,पत्रकार सहित सामाजिक कार्यकर्ता सबके सब निशाने पर हैं उनके ऊपर सत्ता की तलवार लटक रही है। संवैधानिक संस्थायें राजनेताओं की चाकरी कर रहीं हैं और जो जिस हैसियत का है उस पर कानून को किनारे कर अपने राजनैतिक आकाओं की संतुष्टि के लिये फर्जी मुक़दमे लादे जा रहे हैं और जाँच के नाम पर पर प्रताड़ित किया जा रहा है। किसी को सी.बी.आई., ईडी और किसी को पुलिस से डराया जा रहा है। चिंता की बात है कि पुलिस जब पत्रकारों मानवाधिकारों और जागरूक नागरिकों को प्रताड़ना का शिकार बनाती है तो अधिकतर मामलों में देखा गया है कि राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर के मामलों की तो अनुगुंज सुनाई देती है लेकिन जिला और तहसील स्तर के मामलों की घटनाओं को तवज्जो नहीं मिल पाती है क्योंकि पत्रकारों पर स्थानीय प्रशासन का भारी दबाव होता तथा अधिकतर पत्रकार वर्ग विशेष के साथ हो रही क्रूरता पर चुप रहते हैं यह पूरे देश की मीडिया का हाल है। वर्तमान में पत्रकारिता अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। समूचे देश में पुलिस एक खास पेटर्न पर काम कर रही है इसलिये घटनाओं में समानता साफ़ दिखती है। उदहारण के तौर पर सैकड़ों मील दूर बिहार में 8 साल के मुस्लिम बच्चे को पुलिस दंगे के आरोपी के रूप में चिन्हित कर हिरासत में ले लेती है और मध्य प्रदेश में 12 साल की बालिका को पुलिस स्कूल से पकड़कर इतना मारती है कि बालिका अस्पताल पहुंच जाती है। इस तरह के अनगिनत उदाहरण आये दिन देखने को मिल जायेंगे
बिहार के सीवान जिले के बरहरिया शहर में, 8 सितंबर, 2022 को हिंदुत्व समूह की भीड़ का इलाके के एक मस्जिद धावा बोलने के बाद मुस्लिम विरोधी हिंसा भड़क उठी। यह भीड़ लाठी और अन्य हथियारों से लैस थी, भीड़ को कैमरे में भी कैद किया गया है, और इसे लाठी डंडों से लैस देखा और इस्लामोफोबिक, सांप्रदायिक और धमकी भरे नारे लगाते हुए सुना जा सकता है। इसके बाद पुलिस कार्रवाई के नाम पर 8 साल के बच्चे रिजवान अली और 70 साल के \ बीमार दादा को पकड़ लिया। मामला सुर्ख़ियों में आने के बाद मानवाधिकार संगठन नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन (NCHRO) बिहार अध्यक्ष संजय सिंह ने पुलिसिया दमन खिलाफ आवाज उठाई। इसके नतीजे में आज समूचा देश पुलिस की कार्यशैली को देख रहा है।
मध्य प्रदेश की बबली [बदला हुआ नाम] पुलिसिया दमन की शिकार हुई और किसी भी राजनीतिक दल ने 12 वर्षीय मासूम बच्ची के साथ पुलिस द्वारा की गई पिटाई पर अपनी जुबान नहीं खोली है। बताते चलें कि मंगलसूत्र चोरी की शिकायत पर मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में पुलिस द्वारा 12 वर्षीय बालिका को स्कूल से पन्ना कोतवाली में पदस्थ उपनिरीक्षक रचना पटेल द्वार बिना जांच पड़ताल किये पकड़कर जमकर मारपीट की गई। इस सदमे से बालिका की तबियत बिगड़ जाती है और अस्पताल में भर्ती करने की नौबत आ जाती है। इस घटना को हुये तक़रीबन 5 – 6 दिन हो गये हैं लेकिन अभी तक किसी जिम्मेदार पर किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं हुई है। कुछेक अख़बारों ने पीड़ित बालिका की खबर को प्रकाशित किया है जिसमें उपनिरीक्षक रचना पटेल कह रहीं है कि संबंधित मामले में दोनों पक्षों से हम लोगों द्वारा पूछताछ की गई थी आवेदिका तथा अनावेदिका दोनो लोग आईं थीं तथा उनके घर पर जा कर हमारे द्वारा तस्दीक की गई थी किसी प्रकार से कोई मारपीट नही की गई है, इसके अलावा मुझे और जानकारी नही है।
पुलिस के झूठ को बेनकाब करने के लिये बालिका और उसकी माता की वीडियो सामने है जिसमें साफ़ साफ़ सुना और देखा जा सकता है कि कैसे पुलिस 12 साल की बालिका को स्कूल से पकड़कर मारपीट करती है। फिलहाल पीड़ित परिवार डरा हुआ है और कुछ भी कहने की हालत में नहीं है यहाँ तक कि मारपीट की घटना पर बात भी नहीं करना चाहता।
पुलिस की ज्यादती का यह पहला और आखरी मामला नहीं है अक्सर पुलिस अपने कृत्यों पर पर्दा डालने के लिये आला अधिकारी पूरा संरक्षण देते हैं इसलिये भी ऐसी घटनायों की पुनरावृत्ति होती हैं। पुलिस की कार्यप्रणाली पर अदालतों द्वारा कई बार गंभीर टिप्पणियां की गयीं हैं लेकिन वर्तमान में सत्ता पर काबिज खास मानसिकता के कारण पुलिस को एक टूल की तरह उपयोग किया जा रहा है। देश में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व चीफ जस्टिस एनवी रमना की टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है उन्होंने पुलिस की कार्यशैली सवाल खड़े करते हुये कहा था कि ……..
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) एनवी रमना ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि उन्होंने संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में नौकरशाहों, विशेष रूप से पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अत्याचार और शिकायतों की जांच के लिए एक पैनल बनाने के बारे में सोचा था. उन्होंने कहा मुझे इस दिशा में बहुत सारी आपत्तियां हैं, नौकरशाही, विशेष रूप से इस देश में पुलिस अधिकारी कैसे व्यवहार कर रहे हैं. सीजेआई ने कहा, मैं एक समय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में नौकरशाहों, विशेष रूप से पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अत्याचारों और शिकायतों की जांच के लिए एक स्थायी समिति बनाने के बारे में सोच रहा था. मैं इसे रिजर्व रखना चाहता हूं. अभी नहीं करना चाहता।

भारत के प्रधान पूर्व सीजेआई एन.वी. रमना

पूर्व आईपीएस अधिकारी एस.आर. दारापुरी ने अपनी नौकरी के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली को निष्पक्ष बनाने के लिये कई कोशिशें की उनका मानना है कि भारत में अधिकतर पुलिस जातिवादी और सांप्रदायिक भी यह एक सच्चाई है कि आखिर हमारे पुलिस अधिकारी और सिपाही समाज से आते हैं और इसलिए पुलिस संगठन हमारे समाज की सच्ची प्रतिकृति है। यह सर्वविदित है कि हमारा समाज जाति, धार्मिक और क्षेत्रीय आधार पर विभाजित है। इसलिए, जब व्यक्ति पुलिस बल में प्रवेश करते हैं, तो वे अपने सभी पूर्वाग्रहों और द्वेषों को अपने साथ ले जाते हैं। ये पूर्वाग्रह तब और मजबूत हो जाते हैं जब ऐसे व्यक्ति सत्ता के पदों पर आसीन हो जाते हैं। उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह उनके कार्यों को बहुत दृढ़ता से प्रभावित करते हैं। ये पूर्वाग्रह अक्सर उनके व्यवहार और कार्यों में उन स्थितियों में प्रदर्शित होते हैं जहां अन्य जातियों या समुदायों के व्यक्ति शामिल होते हैं। पुलिस के निचले रैंक का व्यवहार मुख्य रूप से उच्च अधिकारियों के नजरिए और व्यवहार पर निर्भर करता है। यदि उच्च अधिकारियों में जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह हैं, तो उनके अधीन पुरुषों के बीच भी ऐसा ही होने की प्रबल संभावना है। मैंने व्यक्तिगत रूप से कई शीर्ष श्रेणी के पुलिस अधिकारियों को अपनी जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को खुले तौर पर प्रदर्शित करते देखा है। निचले रैंक की क्या बात करें, यहां तक कि कई आई.पी.एस. अधिकारी इतने कठोर प्रशिक्षण के बाद भी निचली जातियों और अन्य समुदायों के प्रति अपने दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं दिखाते हैं।
मैंने व्यक्तिगत रूप से कई शीर्ष श्रेणी के पुलिस अधिकारियों को अपनी जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को खुले तौर पर प्रदर्शित करते देखा है। निचले रैंक की क्या बात करें, यहां तक कि कई आई.पी.एस. अधिकारी इतने कठोर प्रशिक्षण के बाद भी निचली जातियों और अन्य समुदायों के प्रति अपने दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं दिखाते हैं। वास्तव में किसी व्यक्ति के दृष्टिकोण में परिवर्तन सबसे कठिन काम है क्योंकि इसके लिए एक अंतर्निहित पूर्वाग्रहों और द्वेषों को दूर करने के लिए बहुत प्रयास की आवश्यकता होती है।

एस.आर. दारापुरी, आई.पी.एस. (से.नि.) द्वारा फेसबुक वाल पर की गई टिप्पणी का हिस्सा।

देखें वीडियो….