”मज़दूर दिवस” नाकाफी है मेहनतकशों का अधिकार दिलाने के लिये

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मज़दूर दिवस की सार्थकता तभी संभव है जब सरकार ईमानदारी से उनकी हाड़तोड़ मेहनत का मुआवजा अपने पूंजीपतियों मित्रों से दिलाने के लिये ईमानदार पहल करे

{sarokaar news} – एम एस खान, हम अपने आसपास और समूची दुनिया में जो बड़ी बड़ी इमारतें दौड़ती रेल गाड़ियों, कारखानों के भीतर से बाहरी दुनिया को सुनाई देने वाली निर्माण की आवाजें,दुनिया को नापती सड़कें और उन सड़कों पर रात दिन दौड़ते बड़े छोटे वाहन और बड़े बड़े पुल यह सब कुछ मज़दूरों की मेहनत और उनके पसीने बहाने के कारण संभव हो पाया है। ऐसे हज़ारों उदाहरण हमारे सामने हैं। मेहनतकशों ने अपने पसीने से सींच कर इस जगत में हमारे जीवन को आसान किया है लेकिन मेहनतकशों को क्या मिला। दुनिया की अधिकतर सरकारें पूंजीपतियों के हितों के लिये काम करतीं हैं और कामगारों के शोषण करने के लिये पूंजीपतियों को खुली छूट देती हैं। आज की अपेक्षा पहले मज़दूरों के काम करने के 15 घंटे अथवा उससे अधिक थे। हाड़तोड़ मेहनतकशों ने जब इस क्रूरता से निजात पाने के लिये अपनी आवाज बुलंद की तो जैसा कि आज हम देखते हैं कि सरकारों द्वारा जब भी नागरिक अपने अधिकारों की मांग करते हैं और विरोध में उठ खड़े होते हैं तो सरकारें डर जातीं हैं। डरी हुयीं सरकारें बल का मनमाना प्रयोग करतीं हैं और आंदोलन को कुचलने के लिये अपने ही नागरिकों का खून बहाने में नहीं हिचकती। आज देश और दुनिया के अधिकतर हिस्सों में पूंजीपतियों और सरकार के नाजायज गठजोड़ से सरकारें संचालित हो रहीं हैं जिसमे आम नागरिकों मेहनतकशों के अधिकारों को किनारे कर पूंजीपतियों के हितों का भरपूर ख्याल रखा जा रहा है। 1 मई 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर में हजारों मजदूरों ने एकजुट होकर बड़ा प्रदर्शन किया था। मज़दूर मांग कर रहे थे मजदूरी का समय 8 घंटे निर्धारित किया जाए तथा हफ्ते में एक दिन की छुट्टी का प्रावधान होना चाहिये। पूंजीपतियों के हितों को देखते हुये सरकार ने अमानवीय तरीके से प्रदर्शनकारी मजदूरों पर गोली चलवा दी जिसमे कई मज़दूर मारे गये और 100 से अधिक मज़दूर बुरी तरह से घायल भी हुये। इसके बावजूद मज़दूरों का यह आंदोलन चलता रहा तथा तीन साल बाद 1889 में पेरिस में हुए इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस में बलिदान देने वाले मजदूरों की याद में 1 मई के दिन को समर्पित करने का फैसला किया गया था।

तब से लेकर आज तक मज़दूरों की ज़िन्दगी में क्या बदलाव आये हैं और मज़दूरों के हितों का संरक्षण कितना हो पाया है यह देखा जाना चाहिये। आज भी पूंजीपतियों और सत्ता का गठजोड़ निर्वाध रूप से चल रहा है मज़दूर आज भी शोषण का शिकार है। मज़दूरों ने काम के घंटे काम करने के लिये अपनी जान देकर अधिकार तो मिल गया लेकिन मज़दूरों की ज़िन्दगी में ऐसे कौन से बदलाव आये हैं जिसपर कहा जा सके कि अब सब ठीक है। दरअसल आज भी मज़दूर भीषण शोषण का शिकार है पूंजीपति मज़दूरों के शरीर का आखिरी खून का कटरा निचोड़ लेना चाहता है और सरकार उनके साथ खड़ी है।

मज़दूर दिवस की सार्थकता तभी संभव है जब सरकार ईमानदारी से उनकी हाड़तोड़ मेहनत का मुआवजा अपने पूंजीपतियों मित्रों से दिलाने के लिये ईमानदार पहल करे।

आज 1 मई को दुनिया भर में मजदूर दिवस मनाया जा रहा है, मई दिवस और इंटरनेशनल लेबर डे का प्रचलन मजदूरों के सम्मान, उनके काम के घंटे, मेहनताने वगैरह को लेकर एक व्यवस्था के लिए आंदोलन शुरू होने की याद में इस दिन को दुनिया के कई देशों में सार्वजनिक अवकाश रहता है तथा मजूदरों के लिए समर्पित उस आंदोलन को शिकागो आंदोलन के नाम से जाना जाता है।