(Sarokaar news) – कन्नूर (केरल)। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के केरल में चल रहे 23वें राष्ट्रीय महाधिवेशन ने दर्ज किया है कि हिंदुत्व नामधारी सांप्रदायिकता मेहनतकश जनता की एकता बिखेर कर विविधताओं के भारत को विभाजितों का भारत बना रही है और इस तरह पूरे भक्ति भाव से कारपोरेटों की सेवा में लगी है। पार्टी महाधिवेशन ने तय किया है कि माकपा हिन्दुत्व की इस साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे होगी और इस संघर्ष को कई स्तरों पर अनवरत तरीके से चलाएगी। इसके लिये पार्टी वामपंथी और जनवादी मोर्चे के निर्माण करेगी, जिसमें उन सभी नागरिकों, संगठनों और सामाजिक आंदोलनों सहित धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताकतों की जगह होगी, जो हिंदुत्ववादी ताकतों की गतिविधियो का मुकाबला करने में तथा नव-उदारवादी नीतियों के खिलाफ और आजीविका के मुद्दों पर संघर्ष विकसित करने में दिलचस्पी रखते हैं।

माकपा महाधिवेशन ने कल तीसरे दिन पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी द्वारा पेश राजनैतिक प्रस्ताव को पारित कर दिया तथा आगामी तीन वर्षों के लिए इस देश की राजनीति में पार्टी के हस्तक्षेप की दिशा तय कर दी। इस प्रस्ताव पर 48 प्रतिनिधियों ने बहस की, जिन्होंने अपने-अपने राज्यों के प्रतिनिधिमंडल की राय को सामने रखा। सभी राज्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। स्वीकृत राजनैतिक प्रस्ताव के अनुसार आगामी दिनों में वामपंथी और जनवादी मोर्चे के कार्यक्रम को सूत्रबद्ध किया जाएगा और राज्यों के स्तर पर इस मोर्चे के निर्माण को प्राथमिकता दी जाएगी। शोषित-उत्पीड़ित जनता के इस मोर्चे और उसकी नीतियों के जरिये पूंजीवादी-सामंती नीतियों का ठोस और वास्तविक विकल्प आम जनता के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।

माकपा महाधिवेशन ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोध का आह्वान किया है, जिसके कारण मुद्रास्फीति को बढ़ावा मिल रहा है। महाधिवेशन में पारित एक प्रस्ताव में रेखांकित किया गया है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय करों में क्रमशः 3.5 और 9 गुना वृद्धि की गई, जिसके कारण केंद्र सरकार के राजस्व में पेट्रोलियम करों की हिस्सेदारी 5.4 प्रतिशत से बढ़कर आज 12.2 प्रतिशत हो गई है और तेल क्षेत्र से केंद्र सरकार का कर संग्रह 2014-15 में 0.74 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2021-22 में 3.5 लाख करोड़ रुपये हो गया है। माकपा ने अपने प्रस्ताव में एनडीए शासन के दौरान लगाए गए अतिरिक्त करों को तत्काल वापस लेने, अमीरों पर कर बढ़ाने, पेट्रोल उत्पादों की खुदरा कीमतों पर नियंत्रण और उसे कम करने की मांग के साथ ही पेट्रोलियम क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण पर रोक लगाने की भी मांग की है।