सत्ता पर काबिज दमनकारी ताक़तों के खिलाफ आशा और उम्मीद की किरण हैं राजीव यादव

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{sarokaar news} – उत्तर प्रदेश में चुनावों की घोषणा हो चुकी है राज्य के सभी राजनीतिक दलों ने वोटरों को लुभाने के लिये कमर कस ली है। वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अपनी पार्टी लाइन के अनुकूल अस्सी बनाम बीस का मुद्दा उछाल दिया है। इसी तरह अन्य दलों ने “अपनी अपनी ढ़पली अपना अपना राग” की तर्ज पर चुनावी समर में वोटरों को लुभाना शुरू कर दिया है। यूपी के पिछले सालों पर नज़र दौड़ाई जाए तो साफ़ पता चलता है कि यह चुनाव साम्प्रदायिक मुद्दों के आधार पर संपन्न होगा।

उत्तर प्रदेश में जहाँ एक ओर साम्प्रदायिक राजनीति पूरे शबाब पर है और तो दूसरी ओर इस चुनाव में एक अकेला ऐसा उम्मीदवार है जो लोकतंत्र के मूल्यों के लिये राजनीति के मैदान में आकर प्रदेश के दबे कुचले वंचितों तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों की लड़ाई को सड़कों से लेकर अदालत तक लम्बे समय से लड़ रहे हैं और अब उनके संगठन ने उन्हें 348 विधानसभा क्षेत्र निज़ामाबाद से मैदान में उतारा है। जी हाँ हम बात कर रहे हैं राजीव यादव की। रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव अपने संघर्ष के लिये जाने जाते हैं उन्होंने समाज में हासिये पर पड़े लोगों के लिये लम्बी लड़ाई लड़ी है और यह सिलसिला अभी भी जारी है। सत्ता पर काबिज दमनकारी ताक़तों के खिलाफ राजीव यादव समूचे उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनावों में एक उम्मीद एक आशा की किरण हैं।

मौजूदा समय में चुनाव लड़ना सत्ताधरियों ने आमजन के लिये दुश्वार बना दिया है,चुनावी प्रक्रिया इतनी मंहगी गयी है कि आम आदमी लोकतंत्र के इस उत्सव में अपनी भागीदारी करने की सोच भी नहीं सकता है, आम आदमी महज एक वोटर है और इसके बाद उसकी किसी दल को कोई जरुरत नहीं है। आमजन की पीड़ा वही नेता समझ सकता है जिसको जनसरोकारी मुद्दों से सरोकार हो और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अटूट विश्वास।

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव का विभिन्न मुद्दों को लेकर किया गया संघर्ष —–
फर्जी मुकदमों के खिलाफ मुहिम

2007 में शुरू हुआ ‘रिहाई आन्दोलन’ 2012 में ‘रिहाई मंच’ में तब्दील हो गया. मुहम्मद शुऐब मंच अध्यक्ष और राजीव यादव वर्तमान में इसके महासचिव हैं. आजमगढ़ को आतंकवाद से जोड़ने की साजिश के खिलाफ 2007 से सक्रिय हुए और चर्चित दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद आजमगढ़ के मुस्लिम युवाओं के उत्पीड़न के खिलाफ उठने वाली आवाज सूबे ही नहीं पूरे देश में आतंकवाद के नाम पर उत्पीड़न के सवाल पर मुखर हुई. महिलाओं के यौन उत्पीड़न, बलात्कार, हत्या खासकर हिरासत में हत्या जैसे महत्वपूर्ण सवालों को उठाया.

राजीव यादव ने आज़मगढ़ समते पूरे सूबे में फर्जी इनकाउंटर में मारे और घायल दलित-पिछड़ों और मुसलमानों के परिजनों से मिल कर उनकी कानूनी लड़ाई में हर संभव सहयोग किया. इनकांउटर की घटनाओं का दस्तावेज़ीकरण कर कानून व्यवस्था के नाम पर होने वाले इन फर्जीवाड़ों को मीडिया से लेकर राष्ट्रीय मावाधिकार आयोग की दहलीज़ तक पहुंचाया. धर्मांतरण के नाम पर ईसाइयों पर फर्जी मुकदमा कायम किया गया तो राजीव यादव ने उसका तथ्य संकलन कर सच्चाई जनता के सामने लाया।

निमेष कमीशन की रिपोर्ट जारी करायी
18 मई 2013 को आतंकवाद के मामले में फंसाए गए खालिद मुजाहिद की हिरासत में मौत के बाद रिहाई मंच ने विधानसभा के सामने 121 दिन लगातार रना दिया. धरना के दबाव में सपा सरकार को आरडी निमेष आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करनी पड़ी. आज तक हाशिमपुरा, मलियाना, मेरठ आदि दंगों की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई पर रिहाई मंच के आंदोलन के दबाव में यूपी सरकार को निमेष आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करनी पड़ी.

रिहाई मंच अध्यक्ष एडवोकेट मुहम्मद शुऐब ने विभिन्न अदालतों में आतंकवाद के जो मुकदमे लड़े, उनमें 14 नौजवानों को अदालत ने बाइज्जत बरी किया. मुहम्मद शुऐब, राजीव यादव और रिहाई मंच के साथियों की मुहिम सिर्फ मुकदमे लड़ने तक सीमित नहीं है बल्कि इस तरह के फर्जी मुकदमे दर्ज न हों, जिससे वंचित तबके को सड़क से लेकर अदालतों के चक्कर न काटने पड़ें.

2015 में रिहाई मंच ने हाशिमपुरा के मामले पर एक सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें राजीव यादव और उनके साथियों पर दंगा भड़काने की कोशिश का आरोप लगाकर यूपी पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज कराया. एक रिसर्च के दौरान राजीव यादव और उनके साथी गुजरात के अहमदाबाद में भी डिटेन किए गए, लेकिन पूछताछ के बाद इन्हें छोड़ दिया गया. इस तरह से राजीव यादव लगातार सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर रहे हैं।

योगी के खिलाफ कोर्ट पहुंचे
पत्रकारिता की पढ़ाई के पहले से ही वो विभिन्न सामाचार पत्रों में लिख रहे थे. जब वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक प्रथम वर्ष में थे तभी उन्होंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाना शुरू किया. ‘सैफ़रॉन वारः ए वार अगेंस्ट नेशन’ और ‘पार्टिशन रिवीजीटेड’ नाम की डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई. सैफ़रॉन वार यूपी की सियासत में काफी चर्चित डॉक्यूमेंट्री है. यूपी के मौजूदा मुख्यमंत्री और गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ ने इस डॉक्यूमेंट्री के विरोध में राजीव यादव और उनके साथियों को इस्लामिक फंडेड व नक्सलियों का समर्थक बताया. बावजूद इसके राजीव यादव पूरी बहादुरी के साथ पूर्वांचल में साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ते रहे, और योगी आदित्यनाथ की साम्प्रदायिक गतिविधियों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट भी गए. मुज़फ़्फ़रनगर साम्प्रदायिक हिंसा के बाद संगीत सोम और सुरेश राणा जैसे नेताओं के खिलाफ एफ़आईआर की तहरीर भी दी. राजीव यादव ने 2015 में अपने साथी के साथ मिलकर ‘ऑपरेशन अक्षरधाम’ नामक पुस्तक भी लिखी।

आरक्षण के मुद्दे पर सक्रिय
2018 में सवर्ण आरक्षण, 13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ, नीट में आरक्षण जैसे सामाजिक न्याय के सवालों पर लगातार सक्रिय रहे. सवर्ण आरक्षण के खिलाफ राजधानी लखनऊ में धरने का आयोजन करते हुए विभिन्न संगठनों के साथ दो दिवसीय प्रतिवाद का भी आयोजन किया. 13 प्वाइंट रोस्टर के लिए आयोजित भारत बंद के आयोजन में रिहाई मंच की यूपी में अहम भूमिका थी.

एससी/एसटी एक्ट को कमजोर करने के खिलाफ 2 अप्रैल 2018 को हुए भारत बंद, 2019 में नागरिकता आंदोलन और 2020 में किसान आंदोलन में भागीदारी की. 2019 में नागरिकता आंदोलन के दौरान लखनऊ समेत पूरे सूबे में हुई हिंसा को लेकर रिहाई मंच निशाने पर आया और उसके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हुआ जिसमें रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब समेत कई लोग महीनों जेल में भी रहे. योगी सरकार ने मंच पर कार्रवाई के लिए गृह मंत्रालय तक को लिखा. इन सब कार्रवाइयों के दौर में भी रिहाई मंच लगातार सक्रिय रहा।

संयुक्त राष्ट्र में उठा था राजीव यादव का मसला
यूपी में भाजपा शासित योगी सरकार में दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के खिलाफ मॉब लिंचिग, एनकाउंटर, गुंडा एक्ट, गैंगेस्टर, रासुका जैसे सवालों को मजबूती से उठाया. फर्जी एनकाउंटर पर सवाल उठाने की वजह से राजीव यादव को फर्जी मुकदमें में फंसाने और जान से मारने की पुलिस की धमकी को संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) ने भी संज्ञान लिया और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले की जांच की.

राजीव यादव उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न के सवालों पर लगातार सक्रिय हैं, चाहे वो पूर्वांचल का सवाल हो या बुंदेलखंड का. दलितों-पिछड़ों-मुसलमानों की हिरासत में मौत जैसे सवालों को प्रमुखता से उठाया, और इन सवालों को लेकर कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया. रिहाई मंच, पूरी प्रक्रिया में अपने आप को मानवाधिकार संगठन से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्षरत संगठन के रूप में जाना जाता है।

आज राजीव यादव अपनी कर्मस्थली उत्तर प्रदेश 348 विधानसभा क्षेत्र निज़ामाबाद से उम्मीदवार हैं। इन विषम परिस्थितियों में भी वह अपनी सशक्त आवाज़ को उत्तर प्रदेश विधानसभा में गुंजायमान करना चाहते हैं। बाहुबल और धनबल के इस दौर में राजीव यादव लोकतंत्र में अपनी पूरी निष्ठा के साथ खड़े हैं। देश के जाने माने बुद्धिजीवियों का खूब समर्थन भी मिल रहा है लेकिन चुनाव लड़ने लिये बेहद जरूरी संसाधनों की कमी साफ़ महसूस हो रही है।

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